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जमीन से आसमान तक असर, एअर इंडिया ने फ्लाइट्स की संख्या घटाई

May 13, 2026 Source: Bharat Vaani

जमीन से आसमान तक असर, एअर इंडिया ने फ्लाइट्स की संख्या घटाई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत की प्रमुख एयरलाइन एअर इंडिया ने अपनी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में अस्थायी कटौती का बड़ा निर्णय लिया है। यह कदम जून से अगस्त 2026 तक तीन महीने के लिए लागू रहेगा। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय रूटों पर उड़ानों की संख्या कम की जाएगी या उन्हें अस्थायी रूप से निलंबित किया जाएगा, हालांकि एक मजबूत वैश्विक नेटवर्क बनाए रखने की योजना जारी रहेगी। इस फैसले के पीछे मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी और पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव बताया जा रहा है। विमानन उद्योग के लिए सबसे बड़ा खर्च एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) होता है, जिसकी कीमतों में लगातार वृद्धि से एयरलाइनों की परिचालन लागत पर भारी दबाव पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, ATF की कीमतें 160 डॉलर प्रति बैरल से अधिक स्तर तक पहुंच चुकी हैं, जो एयरलाइन की कुल लागत का एक बड़ा हिस्सा बनती हैं। एअर इंडिया ने बताया कि वह हर महीने लगभग 1200 अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का संचालन जारी रखेगी, ताकि यात्रियों को एक स्थिर और व्यापक नेटवर्क उपलब्ध हो सके। इसके तहत उत्तर अमेरिका, यूरोप, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, सुदूर पूर्व, SAARC देशों और मॉरीशस जैसे क्षेत्रों के लिए सीमित लेकिन नियमित उड़ानें जारी रहेंगी। सरकार और आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी इस निर्णय को जोड़ा जा रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से विदेशी यात्राओं को सीमित करने और आर्थिक अस्थिरता के समय खर्च में संयम बरतने की अपील की थी। इसके साथ ही वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव और रुपये पर दबाव की स्थिति को देखते हुए यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस बदलाव का सीधा असर यात्रियों पर पड़ सकता है। गर्मियों की छुट्टियों के दौरान अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की उपलब्धता कम होने से टिकटों की मांग बढ़ सकती है, जिससे किराए भी महंगे होने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो आने वाले महीनों में विमानन उद्योग को और भी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कुल मिलाकर, एअर इंडिया का यह फैसला वैश्विक ऊर्जा संकट, आर्थिक दबाव और परिचालन लागत को संतुलित करने की एक रणनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।